वह हर बार सकुचाई सी
भीड़ से बस ओझल हो जाना चाहती थी।
वह कभी नहीं चाहती थी कि भीड़ की आँखें
एक क्षण के लिए भी उस पर टिकें।
वह चाहती थी कि वह अपनी बात कह भी दे,
भीड़ को सब सुनाई भी दे जाए,
पर बस लोगों की आवाजाही में उसके होने का
या उसकी बातों के ठीक उसी समय वहां उपस्थित होने का
कोई भी प्रमाण शेष न बचे।
उसे बस इस बात की चिंता सताती कि कहीं कोई
लोगों के घेरे में उसके न होने की वास्तविकता या
उसकी बातों पर प्रकाश डालने की कमी महसूस न करे।
उसे भलीभांति ज्ञात था कि
अपनी इन सब बातों से वो दिन प्रतिदिन
सभी से दूर होती जा रही है,
कहीं ऐसी दिशा में बढ़ती जा रही है जहां
एकांत होने की संभावना अधिक है।
खैर.. वो चाहती भी तो यही थी।
मानो जैसे नाव में बैठ
किसी एकांत द्वीप की ओर बढ़ती चली जा रही हो,
जहां प्रकृति के सिवाय मनुष्य के नाम पर
मनुष्य की परछाई भी ना हो।
इन सब विचारों के चलते
तब वह बस बीस इक्कीस बरस तक की थी।
उसे दुनिया घूमना अच्छा लगता था,
दुनियावालों के साथ घूमना नहीं..
उसे अपनी बातें सुनाना अच्छा लगता था,
सबके सामने कहना नहीं..
गोला बना कर खड़े होते तो कुछ देर बाद
वो सबसे पहले बिना कुछ कहे चुपचाप वहां से ओझल हो जाती,
जैसे कभी उस घेराव में वो वहां थी ही नहीं।
कमाल ये भी होता था कि उसके जाने को
कोई महत्व भी नहीं देता था।
ना ही उसके बारे में उसके बाद कोई बात करता था।
पर अब वह छब्बीस बरस की है।
अब वह ओझल नहीं होना चाहती और ना ही होती है।
अब वह कई बार अपना पक्ष भी रखती है।
उसे अब भी दुनिया घूमना अच्छा लगता है
और कमाल ये की दुनियावालों के साथ घूमना भी।
अब उसने बीते सप्ताह ही तीन नहीं बल्कि
लगभग तीन सौ लोगों के सामने अपनी कविताएं सुनाई,
अपने विचार रखे,
बजाय घेरे से ओझल होने के
सामने बैठी भीड़ के आगे अपनी बातें स्पष्ट रखी।
और अंत में खूब तालियां बटोरी अपने लिए
और साथ ली तस्वीरें भीड़ के कुछ हिस्सों के साथ।
अब इस भीड़ को वह भीड़ नहीं बल्कि
अपनी जीवन यात्रा के सहयात्री मानती है
और उनसे भागने के बजाय अब वह उनके साथ चलने,
उनके सामने बात रखने को अधिक महत्व देती है।
उसे बीते सप्ताह दैनिक जागरण की ओर से
आयोजित कवि सम्मेलन में
इतने बेहतरीन कलाकारों के सामने
अपनी कविताएं सुनाने का अवसर मिला।
(शेष कॉमेंट बॉक्स में है.. ज़रूर पढ़िएगा..)
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छोटी उम्र से ही लोगों की भीड़ से घिरे रहने में मेरी कोई रुचि नहीं थी, लिहाज़ा दोस्तों का कोई बड़ा जत्था भी आगे-पीछे नहीं था। उस समय मोहल्ले की सकड़ी गलियों में कभी ज्यादा खेल नहीं खेले थे। स्कूल के किसी कार्यक्रम में कभी भाग नहीं लिया था। एक अजीब सा डर सफेद कपड़े पर गिरी हल्दी की भांति मुझसे चिपका रह जाता था। और फिर केंद्र की ओर सिकुड़ती भौहें, सकपकाई शक्ल, यहां-वहां तैरती आँखें, जिनसे पूछा जाए अभी-अभी यहां क्या देखा तो याद ना हो, और एक बेहद अजीब भाव चेहरे पर आ बैठता। वो डर ऐसा कि कब कोई क्या सवाल पूछ ले, कहीं अपना नाम तक बताने में न हिचक जाऊं, किसी ने पूछ लिया बारह का पहाड़ा सुनाओ, तो उस क्षण बारह दुनी भी याद न आएगा, क्योंकि सारा ध्यान मैंने इसके परिणाम में लगाया हुआ है, और बाद इसके अगला सवाल क्या होगा क्या मालूम। मुझे बारह के पहाड़े में कोई रुचि नहीं थी। थोड़ा जीवन और जीया, पर फिर भी किसी नए व्यक्ति से बातचीत करने से पहले एक बेचैनी रात भर काटती थी मुझको, जैसे कई बार कोई नया जूता पहनने पर काटता है दिन भर। हिचक मन में बैठी रहती, सभी शब्द गले में अटके रह जाते फिर लड़खड़ाए हुए बाहर को आते। मुझसे अव्वल दर्जे के लोगों द्वारा आंके जाने का बोध हो या फिर हो भावना व्यक्त करने की कोई बात। इन सबके आगे खड़े होकर इन्हें जीने के बजाय मुझे इनसे भागना अधिक सरल लगता था।
बीती 2 और 3 फरवरी को इन सबका विपरीत अनुभव किया। बहुत लोग थे, ढेरों आँखें थी, एक साथ कईं आवाज़ें, हर व्यक्ति मिलने पर मेरी बात सुन रहा था और मैं उन्हें सुन रही थी, मैं कहने में समर्थ थी, उनकी सराहना बटोरने से मेरा मन नहीं ऊब रहा था। भौहें केंद्र को नहीं थी, आँखें ठीक उन आंखों में देख रही थी जो मुझे देख रही थी, कान उसी आवाज़ के पीछे थे जो मेरा नाम लेते हुए मेरी कविताओं को सराह रही थी। उस रोज़ सवालों से डर नहीं लग रहा था, उत्तर बिना हिचक के दिए गए, होठों की हसीं अपना स्थान नहीं छोड़ रही थी, स्वयं को अधिक सहज महसूस कर रही थी। उस दिन पहले से अधिक विश्वास हुआ कि मेरे भाव किसी कार्य में मेरी रुचि के आधार पर झलकते हैं। जहां 9-10 बरस की मैं भीड़ देख कर बिदक जाती थी कि जाने कब कौनसा पहाड़ा पूछ ले कोई, वहीं अब 25 बरस की मैं नए लोगों से बात करने में सहज महसूस कर रही थी।
अंततः उस माहोल से बाहर आने का मन नहीं था। वे लोग, भाव, सराहनाएं, वे चुप चेहरे मेरी बात सुनते हुए, मुस्काने, सभी आँखें मेरे साथ हो चली। मैं वहां से लौट आई, पर ये सब मुझ में से ना लौट पाए।❤️
~ऐश्वर्या शर्मा
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"जाना ज़रूरी है क्या!"- मेरी पहली किताब
(कविता संग्रह) प्रकाशित हो चुकी है।
हर किसी के हिस्से कोई जगह आती है
जहां उसकी कोई याद कहीं बची रह सके,
मैंने इस किताब में रहना चुना है।
कुछ चीज़ें हम समय के साथ जी लेते हैं,
और कुछ चीज़ें जीते जी हम में रह जाती हैं।
मैं हमेशा पहली बात को
अपने साथ घटते देखना चाहूंगी,
वो चीज़ें जो मैंने अपने लिए सोची हों,
वो सभी जीना चाहूंगी।
कम से कम इतना
हम सबके हिस्से आना चाहिए कि
जो क्षण हमने पूरे जीवन
केवल अपने लिए बचाया हो,
समय रहते उस क्षण को
जीने का अवसर हमें मिल जाना चाहिए।
ये अवसर कोई आपके लिए
समय से छीन कर आप तक नहीं पहुंचाएगा,
इसे आपको खुद ढूंढना होगा
या बनाना होगा।
बीते कुछ सालों से
मैं अपने लिए इन क्षणों को बचा रही थी,
और अब वो क्षण आ गया है जब मैं इन्हें जी रही हूं।
मैंने अपने लिए ये अवसर
इस किताब के रूप में ढूंढ कर
बचाए हुए इन क्षणों को जीना शुरू कर दिया है।
आख़िरकार हम वो समय जी लेते हैं,
जो वास्तव में हमारे लिए होता है।
"जाना ज़रूरी है क्या!" अब आपके लिए है,
पढ़िए और अपना प्रेम भेजते रहिए।
मुझे किताब के साथ आपकी तस्वीरों
और "जाना ज़रूरी है क्या!" से आपकी
पसंदीदा पंक्तियों की प्रतीक्षा रहेगी।🦋🪻
(किताब का लिंक bio में है,
किताब के लिंक के लिए आप मुझे msg भी कर सकते हैं।)
~ऐश्वर्या शर्मा 'आईना'
(सभी तस्वीरें बीते रविवार की हैं..)
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कहानी का अंत
हम अपने हिसाब से बदल पाते
तो अच्छा होता,
और इसके अंत में मैं तुम्हें
और तुम मुझे मिल पाते
तो अच्छा होता..!!
🥀
~ऐश्वर्या शर्मा 'आईना'
.
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#relatewithaaina
#poetry #hindipanktiyaan #dhurandharsong
मुझे अक्सर याद रहती है वो बातें
जो मैं भूलना चाहता हूं,
अब मैं भूलने से नहीं डरता
मैं याद रखने से डर जाता हूं।
🥀
~ऐश्वर्या शर्मा 'आईना'
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कहानी का अंत
हम अपने हिसाब से बदल पाते
तो अच्छा होता,
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~ऐश्वर्या शर्मा 'आईना'
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