कभी तो किया होगा मैंने भी अच्छा किसी के साथ,
कभी तो चल दिया होगा किसी के साथ।
कभी तो समेटा होगा बिखरे ख़्वाबों को पलकों पर,
कभी तो ख़ुद को ढूँढा होगा किसी अजनबी के साथ।
कभी तो दिखाई होगी मैंने किसी को राह सच्ची,
कभी किसी का प्यार मिला दिया होगा उसी के साथ।
कभी तो ख़ुद का दिल भी तुड़वा लिया होगा हँसकर,
कभी तो टूटा दिल लेकर भटका होगा किसी के साथ।
कभी तो जलाए होंगे तूफ़ानों में उनके लिए चराग़,
कभी ख़ुद का अंधेरा भी बाँट लिया होगा ख़ुद ही के साथ।
कभी तो छोड़ी होगी नींद सुकून की किसी के लिए,
कभी तो किसी के ख़्वाबों में जागा होगा ख़ुशी के साथ।
कभी तो आँखों में घूमा होगा लहू लेकर दर-दर,
कभी तो यूँ ही टाल दिए होंगे ताने हँसी के साथ।
कभी तो किसी की आँख का नूर बनकर देखा होगा,
कभी तो नहीं मिला होगा हारे में भी किसी का साथ।
और कितनी ही बार सिर्फ़ अपने सब्र से
दुखती कमर में
चढ़ते बुख़ार में
बाहर के तूफ़ान में
भीतर की बाढ़ में
उन्होंने खाना बनाया
फिर वात्सल्य में भरकर
उन्होंने उमगकर खाना बनाया
-कुमार अम्बुज
फिर बरसों के मोह को एक ज़हर की तरह पीकर उसने काँपते हाथों से मेरा हाथ पकड़ा। चल! क्षणों के सिर पर एक छत डालें। वह देख! परे – सामने उधर सच और झूठ के बीच कुछ ख़ाली जगह है।
- अमृता प्रीतम